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अनहोनी रात

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अनहोनी रात

शाम ढल रही थी, और हिमालय की तलहटी में बसा छोटा सा गाँव ‘शांतिपुर’ अपने नाम के विपरीत एक अजीब सी खामोशी में डूबा हुआ था। हर तरफ़ ऊँचे देवदार के पेड़ और दूर से आती नदी की कलकल ध्वनि ही सुनाई दे रही थी। यूँ तो शांतिपुर अपने शांत और सुरम्य वातावरण के लिए जाना जाता था, पर आज की शाम कुछ अलग थी। हवा में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई अनहोनी होने वाली हो।

गाँव के किनारे स्थित, पुराना पत्थर का बना घर, जिसमें रोहन और उसकी छोटी बहन रिया रहती थी, भी इस खामोशी से अछूता नहीं था। उनके माता-पिता एक सप्ताह पहले शहर गए थे, और बच्चों को अपने बूढ़े दादाजी के भरोसे छोड़ गए थे। दादाजी अपने समय के बहुत बड़े शिकारी थे, और उनके किस्से गाँव में मशहूर थे। लेकिन अब उनकी उम्र हो चुकी थी और उनकी याददाश्त भी कमज़ोर हो चली थी।

रोहन, जिसकी उम्र मुश्किल से बारह साल थी, अपनी नौ साल की बहन रिया को दिलासा दे रहा था। रिया को अँधेरे से बहुत डर लगता था, और आज की रात तो ख़ास तौर पर काली लग रही थी। “रोहन भैया, मुझे डर लग रहा है। मम्मी-पापा कब आएँगे?” रिया ने अपनी छोटी सी आवाज़ में पूछा, खिड़की से बाहर देखते हुए, जहाँ चाँद बादलों में छिपा था।

“घबराओ मत रिया, वो कल सुबह तक आ जाएँगे। दादाजी हैं ना हमारे साथ,” रोहन ने उसे गले लगाते हुए कहा, लेकिन उसके दिल की धड़कनें भी तेज़ थीं। दादाजी कमरे के कोने में अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे ऊँघ रहे थे।

अचानक, बाहर से एक तेज़ आवाज़ आई। ऐसी आवाज़, जो शांतिपुर के लोगों ने पहले कभी नहीं सुनी थी। यह किसी जानवर की दहाड़ नहीं थी, बल्कि एक गहरी, गूँजती हुई गर्जना थी, जो धरती को कंपा रही थी। दादाजी चौंककर उठे। उनकी आँखें बुढ़ापे के बावजूद चमक उठीं, जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो।

“यह… यह तो वही आवाज़ है,” दादाजी फुसफुसाए, “कई साल पहले, जब मैं छोटा था, मेरे दादाजी ने एक ऐसी ही रात का ज़िक्र किया था। एक ऐसा जीव जो अँधेरे में शिकार करता है, और जिसकी दहाड़ से पहाड़ भी काँप उठते हैं।”

रोहन और रिया एक-दूसरे को देखने लगे। क्या दादाजी फिर से अपनी पुरानी कहानियों में खो गए थे? लेकिन बाहर की आवाज़ें बढ़ती जा रही थीं। हवा में एक अजीब सी गंध फैल गई, जैसे जंगल में आग लगी हो, लेकिन आग कहीं नहीं थी।

तभी, उनके घर का दरवाज़ा ज़ोर से खटखटाया गया। इतनी तेज़ी से कि मानो कोई उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा हो। रोहन ने हिम्मत करके पूछा, “कौन है?”

बाहर से कोई जवाब नहीं आया, सिर्फ़ खटखटाने की आवाज़ और तेज़ हो गई। दादाजी ने धीरे से कहा, “बेटा, दरवाज़ा मत खोलना। यह वह नहीं है जिसे तुम जानते हो।”

रोहन और रिया खिड़की के पास गए। बाहर घना अँधेरा था, और बारिश शुरू हो चुकी थी। बिजली कड़की और उन्होंने देखा कि गाँव के कुछ घरों की बत्तियाँ बुझ गई थीं। गाँव में दहशत फैल रही थी। दूर से चीखने की आवाज़ें आ रही थीं।

“हमें क्या करना चाहिए, दादाजी?” रिया रोने लगी।

दादाजी ने गहरी साँस ली। उनकी पुरानी शिकारी वाली प्रवृत्ति जाग उठी थी। “सुनो बच्चों, मेरे दादाजी ने बताया था कि उस जीव को सिर्फ़ रोशनी से दूर रखा जा सकता है। हमारे पास सिर्फ़ यह एक लालटेन है। हमें इसे बुझने नहीं देना है।”

लालटेन की छोटी सी लौ ही उनकी एकमात्र उम्मीद थी। लेकिन अचानक, दरवाज़े पर फिर से ज़ोरदार टक्कर हुई, और इस बार दरवाज़ा अपने कब्ज़ों से उखड़कर अंदर आ गिरा। एक काली परछाई दरवाज़े पर खड़ी थी, जिसकी आँखें अँधेरे में लाल चमक रही थीं। वह एक विशालकाय, भयानक आकृति थी, जिसके शरीर से धुंआ निकल रहा था।

रोहन ने बिना सोचे-समझे, दादाजी द्वारा बताए गए नुस्खे को आज़माया। उसने तुरंत लालटेन को उठाया और उसे परछाई की ओर कर दिया। जैसे ही लालटेन की रोशनी उस पर पड़ी, वह परछाई पीछे हटी, मानो उसे दर्द हुआ हो। वह गर्जना करने लगी और उसकी आवाज़ और भी भयानक हो गई।

“इसको भगाओ! रोशनी से!” दादाजी चिल्लाए।

रोहन और रिया, दोनों ने हिम्मत बटोरी। रिया ने घर के अंदर रखी मोमबत्तियों को जलाना शुरू किया, और रोहन लालटेन लेकर उस परछाई का सामना करने लगा। परछाई हर बार रोशनी से पीछे हटती, लेकिन वह पूरी तरह से भाग नहीं रही थी। वह बार-बार घर में घुसने की कोशिश करती रही।

यह रात घंटों चली। बिजली कड़कती रही, बारिश होती रही, और वह भयानक परछाई उनके घर को घेरे रही। रोहन और रिया बारी-बारी से लालटेन और मोमबत्तियों को जलाए रखते, अपनी पूरी हिम्मत से उसका सामना करते रहे। दादाजी उनके पास बैठे, अपने मंत्र बुदबुदाते रहे और उन्हें प्रेरणा देते रहे।

सुबह होने लगी। पूरब में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी। जैसे ही सूरज की पहली किरणें पहाड़ों से होकर गाँव पर पड़ीं, वह भयानक परछाई एक ज़ोरदार चीख के साथ धुंए में बदल गई और हवा में गायब हो गई।

रोहन और रिया थके हुए, पर जीत की भावना के साथ एक-दूसरे को देखने लगे। उन्होंने एक अनहोनी रात का सामना किया था और उसमें सफल हुए थे। जब उनके माता-पिता अगले दिन पहुँचे, तो उन्होंने गाँव की हालत देखी – कई घरों में तोड़-फोड़ हुई थी, और लोग डरे हुए थे। लेकिन रोहन और रिया का घर सुरक्षित था। दादाजी ने उन्हें पूरी कहानी सुनाई, लेकिन गाँव के कुछ लोगों ने इसे बुढ़ापे का भ्रम समझा। पर रोहन और रिया जानते थे कि उन्होंने क्या देखा था। उन्होंने उस रात सिर्फ़ एक भयानक जीव का सामना नहीं किया था, बल्कि अपनी हिम्मत और एकता की शक्ति को भी पहचाना था। वह रात हमेशा उनके लिए एक अनहोनी रात रही, जिसने उन्हें सिखाया कि सबसे गहरे अँधेरे में भी, उम्मीद की छोटी सी लौ सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

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